पिता की पेंशन पर अब तलाकशुदा बेटी का भी पूरा अधिकार, एमपी हाईकोर्ट ने दिया ऐतिहासिक फैसला
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि सरकारी कर्मचारी की तलाकशुदा बेटी को परिवार के सदस्य का दर्जा देने से इनकार करना, समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि तलाकशुदा बेटी भी फैमिली पेंशन पाने की हकदार है. अदालत ने माना कि विवाहित, अविवाहित और विधवा बेटियों की तरह तलाकशुदा बेटी भी परिवार का हिस्सा है. उसे अधिकारों से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन होगा. कोर्ट ने 90 दिनों में पेंशन लाभ देने के निर्देश दिए हैं.
जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने फैमिली पेंशन को लेकर एक ऐतिहासिक और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि तलाकशुदा बेटी को केवल उसकी वैवाहिक स्थिति के आधार पर परिवार की परिभाषा से बाहर नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि अविवाहित, विवाहित और विधवा बेटियों को परिवार का सदस्य माना जाता है, तो तलाकशुदा बेटी को इस अधिकार से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद-14 के तहत प्रदत्त समानता के अधिकार का उल्लंघन होगा।
हाईकोर्ट का यह फैसला उन हजारों महिलाओं के लिए बड़ी राहत लेकर आया है, जो तलाक के बाद आर्थिक रूप से अपने माता-पिता पर निर्भर रहती हैं और जीवनयापन के लिए संघर्ष करती हैं। न्यायालय ने कहा कि कानून की व्याख्या समय की सामाजिक परिस्थितियों और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप की जानी चाहिए।
ज्योति श्रीवास्तव की याचिका पर आया फैसला
यह मामला जबलपुर निवासी ज्योति श्रीवास्तव से जुड़ा है। उनके पिता शंकर लाल श्रीवास्तव मध्यप्रदेश होमगार्ड विभाग में जिला कमांडेंट के पद पर कार्यरत थे। वर्ष 2001 में सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने अपनी तलाकशुदा बेटी ज्योति को फैमिली पेंशन के लिए नामांकित किया था। उस समय ज्योति अपने पिता पर आश्रित थीं और उनका भरण-पोषण भी पिता द्वारा ही किया जा रहा था।
पिता के निधन के बाद ज्योति ने फैमिली पेंशन प्राप्त करने के लिए संबंधित विभाग में आवेदन किया। लेकिन विभाग ने यह कहते हुए उनका आवेदन निरस्त कर दिया कि पेंशन नियमों में तलाकशुदा बेटी को परिवार की श्रेणी में शामिल नहीं किया गया है। विभागीय निर्णय से असंतुष्ट होकर ज्योति श्रीवास्तव ने न्याय के लिए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
विभाग के तर्क को अदालत ने नहीं माना
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस विशाल धगट की एकलपीठ ने विभाग के तर्कों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि केवल इसलिए कि पेंशन नियमों में तलाकशुदा बेटी का अलग से उल्लेख नहीं है, इसका अर्थ यह नहीं निकाला जा सकता कि उसे परिवार का सदस्य नहीं माना जाएगा।
न्यायालय ने कहा कि मध्यप्रदेश सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1976 में अविवाहित, विवाहित और विधवा बेटियों को परिवार की परिभाषा में शामिल किया गया है। ऐसे में तलाकशुदा बेटी को इस दायरे से बाहर रखना न केवल भेदभावपूर्ण होगा, बल्कि संविधान के समानता सिद्धांत के भी विरुद्ध होगा।
अनुच्छेद-14 का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में संविधान के अनुच्छेद-14 का विशेष उल्लेख किया। यह अनुच्छेद सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता और समान संरक्षण का अधिकार प्रदान करता है।
अदालत ने कहा कि यदि एक विवाहित बेटी को परिवार का हिस्सा माना जा सकता है, तो तलाकशुदा बेटी को परिवार से बाहर रखने का कोई तार्किक और कानूनी आधार नहीं है। ऐसा करना मनमाना और असंवैधानिक होगा।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी महिला की वैवाहिक स्थिति उसके अधिकारों को सीमित करने का आधार नहीं बन सकती। तलाकशुदा बेटी भी अपने माता-पिता के परिवार का हिस्सा होती है और यदि वह उन पर आश्रित है, तो उसे फैमिली पेंशन का लाभ मिलना चाहिए।
सामाजिक वास्तविकताओं को समझना जरूरी
फैसले में अदालत ने आधुनिक सामाजिक परिस्थितियों का भी उल्लेख किया। न्यायालय ने कहा कि वर्तमान समय में बड़ी संख्या में महिलाएं विवाह टूटने के बाद अपने मायके लौटती हैं और आर्थिक रूप से अपने माता-पिता पर निर्भर रहती हैं।
ऐसी महिलाओं को केवल तकनीकी आधार पर या नियमों की संकीर्ण व्याख्या करके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। कानून का उद्देश्य लोगों को न्याय और सुरक्षा प्रदान करना है, न कि उन्हें उनके वैध अधिकारों से दूर करना।
कोर्ट ने कहा कि सामाजिक न्याय और समानता संविधान की मूल भावना है। इसलिए नियमों की व्याख्या करते समय संवैधानिक मूल्यों को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
निर्धारित समय सीमा में पेंशन देने के निर्देश
हाईकोर्ट ने संबंधित विभाग को निर्देश दिया कि वह निर्धारित समय सीमा के भीतर ज्योति श्रीवास्तव को फैमिली पेंशन का लाभ उपलब्ध कराए। साथ ही अदालत ने यह भी संकेत दिया कि भविष्य में ऐसे मामलों में विभागों को अधिक संवेदनशील और संवैधानिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
न्यायालय ने कहा कि प्रशासनिक निर्णय केवल नियमों की शाब्दिक व्याख्या पर आधारित नहीं होने चाहिए, बल्कि उनमें न्याय, समानता और मानवीय दृष्टिकोण भी झलकना चाहिए।
हजारों महिलाओं को मिलेगा लाभ
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में कई मामलों के लिए नजीर साबित होगा। मध्यप्रदेश सहित देशभर में ऐसी अनेक महिलाएं हैं जो तलाक के बाद अपने माता-पिता के साथ रहती हैं और उनकी आय का कोई स्थायी स्रोत नहीं होता।
अब इस फैसले के बाद ऐसी महिलाओं को फैमिली पेंशन के अधिकार के लिए मजबूत कानूनी आधार मिलेगा। इससे उनके आर्थिक सशक्तिकरण और सामाजिक सुरक्षा को भी मजबूती मिलेगी।
सरकारी विभागों के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश
हाईकोर्ट का यह आदेश सरकारी विभागों और प्रशासनिक अधिकारियों के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी नियम की व्याख्या करते समय संवैधानिक मूल्यों और समानता के सिद्धांत को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे भविष्य में पेंशन और अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जुड़े मामलों में भी न्यायसंगत दृष्टिकोण अपनाने का मार्ग प्रशस्त होगा।
महिलाओं के अधिकारों की दिशा में बड़ा कदम
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट का यह फैसला केवल एक व्यक्ति को राहत देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह महिलाओं के अधिकारों, समानता और सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण न्यायिक पहल के रूप में देखा जा रहा है। अदालत ने यह संदेश दिया है कि कानून का उद्देश्य किसी वर्ग को अधिकारों से वंचित करना नहीं, बल्कि सभी को समान अवसर और सुरक्षा प्रदान करना है।
तलाकशुदा बेटियों को परिवार का अभिन्न हिस्सा मानते हुए उन्हें फैमिली पेंशन का अधिकार देना न केवल संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करता है, बल्कि समाज में महिलाओं की गरिमा और आर्थिक सुरक्षा को भी मजबूत बनाता है। यह फैसला आने वाले समय में कई महिलाओं के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का आधार बन सकता है।
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस