MP हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: राज्य परिवहन प्राधिकरण के पुनर्गठन पर लगाई रोक, सरकार ने खुद मानी कानूनी चूक
प्रदेश में बस परमिट जारी करने, रूट आवंटित करने और परिवहन नीति से जुड़े कई महत्वपूर्ण फैसले लेने वाली संस्था राज्य परिवहन प्राधिकरण है। ऐसे में हाईकोर्ट के इस आदेश को परिवहन क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
STA पुनर्गठन की अधिसूचना पर अंतरिम रोक, हाईकोर्ट ने IAS मनीष सिंह से मांगा जवाब; ग्वालियर से भोपाल शिफ्टिंग की आशंका पर भी उठा विवाद
ग्वालियर। मध्य प्रदेश राज्य परिवहन प्राधिकरण (STA) के पुनर्गठन को लेकर जारी अधिसूचना पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने अंतरिम रोक लगा दी है। इस मामले ने राज्य सरकार की एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रक्रिया को कानूनी विवाद के केंद्र में ला दिया है। खास बात यह रही कि सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने स्वयं स्वीकार किया कि पुनर्गठन प्रक्रिया में कुछ कानूनी खामियां रह गई हैं, जिन्हें दूर करने के लिए सरकार ने अदालत से तीन माह का समय मांगा है। हाईकोर्ट ने इस मामले में वरिष्ठ आईएएस अधिकारी मनीष सिंह से भी जवाब तलब किया है।
राज्य परिवहन प्राधिकरण प्रदेश में बस परमिट जारी करने, रूट आवंटन, सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था और परिवहन नीति से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाली प्रमुख संस्था है। ऐसे में इसके पुनर्गठन पर लगी रोक का असर प्रदेश की परिवहन व्यवस्था से जुड़े कई प्रशासनिक फैसलों पर पड़ सकता है।
याचिका में उठाए गए गंभीर सवाल
यह मामला हरिशंकर सिंह पटेल और अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर याचिका के माध्यम से हाईकोर्ट पहुंचा। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एमपीएस रघुवंशी और हिमांशु शर्मा ने अदालत में दलील दी कि राज्य सरकार ने 9 फरवरी 2026 को जारी अधिसूचना में मोटर वाहन अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन किया है।
याचिका में कहा गया कि परिवहन विभाग के सचिव को राज्य परिवहन प्राधिकरण की संरचना में शामिल किया गया है, जबकि संबंधित अधिकारी राज्य सड़क परिवहन निगम के प्रबंध निदेशक का दायित्व भी संभाल रहे हैं। इस स्थिति से हितों के टकराव (Conflict of Interest) की आशंका पैदा होती है, जो निष्पक्ष प्रशासनिक व्यवस्था के सिद्धांतों के विपरीत है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि किसी ऐसे अधिकारी को निर्णय लेने वाली संस्था में शामिल करना, जो परिवहन निगम के संचालन से भी सीधे जुड़ा हो, प्रशासनिक पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है।
सरकार ने स्वीकार की कानूनी कमियां
सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से अदालत को बताया गया कि पुनर्गठन प्रक्रिया में कुछ कानूनी विसंगतियां सामने आई हैं। सरकार ने अदालत से अनुरोध किया कि इन कमियों को दूर करने के लिए उसे तीन महीने का समय दिया जाए।
सरकार की इस स्वीकारोक्ति को मामले में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि सामान्यतः प्रशासनिक फैसलों का अदालत में बचाव किया जाता है। लेकिन इस मामले में सरकार ने स्वयं माना कि अधिसूचना और प्रक्रिया की कानूनी समीक्षा की आवश्यकता है।
इसके बाद हाईकोर्ट ने फिलहाल पुनर्गठन संबंधी अधिसूचना पर रोक लगाते हुए संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। अदालत ने वरिष्ठ आईएएस अधिकारी मनीष सिंह को भी नोटिस जारी कर अपना पक्ष प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
ग्वालियर से भोपाल स्थानांतरण की आशंका बनी विवाद का केंद्र
मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू राज्य परिवहन प्राधिकरण के संभावित स्थानांतरण को लेकर भी सामने आया है। याचिकाकर्ताओं, अधिवक्ताओं और बस ऑपरेटरों का आरोप है कि पुनर्गठन की प्रक्रिया के माध्यम से राज्य परिवहन प्राधिकरण के संचालन को ग्वालियर से भोपाल स्थानांतरित करने की तैयारी की जा रही है।
हालांकि राज्य सरकार की ओर से इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन परिवहन क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि पुनर्गठन के पीछे यह एक प्रमुख उद्देश्य हो सकता है।
यदि भविष्य में प्राधिकरण का मुख्यालय ग्वालियर से भोपाल स्थानांतरित किया जाता है, तो प्रदेशभर के बस संचालकों, परमिट धारकों और परिवहन व्यवसाय से जुड़े लोगों को नई प्रशासनिक व्यवस्था का सामना करना पड़ेगा। इससे कई प्रक्रियाओं में बदलाव संभव है और परिवहन व्यवसायियों की कार्यप्रणाली भी प्रभावित हो सकती है।
बस ऑपरेटरों में बढ़ी चिंता
हाईकोर्ट में मामला पहुंचने के बाद प्रदेश के बस ऑपरेटरों और परिवहन व्यवसायियों के बीच भी चिंता का माहौल है। उनका कहना है कि राज्य परिवहन प्राधिकरण परिवहन क्षेत्र की रीढ़ माना जाता है और इसकी संरचना में किसी भी प्रकार का बदलाव व्यापक प्रभाव डाल सकता है।
ऑपरेटरों का मानना है कि यदि पुनर्गठन कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना किया जाता है तो इससे परमिट वितरण, रूट निर्धारण और परिवहन नीतियों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। इसलिए किसी भी बदलाव से पहले सभी संबंधित पक्षों से चर्चा और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन आवश्यक है।
हाईकोर्ट की निगरानी में आगे बढ़ेगा मामला
फिलहाल हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद 9 फरवरी 2026 की अधिसूचना प्रभावहीन हो गई है और राज्य परिवहन प्राधिकरण पूर्व व्यवस्था के अनुसार कार्य करता रहेगा। अदालत अब सरकार और संबंधित अधिकारियों के जवाब का इंतजार करेगी।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले का फैसला भविष्य में राज्य परिवहन प्राधिकरण की संरचना और कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकता है। साथ ही यह भी तय होगा कि प्रशासनिक पुनर्गठन की प्रक्रिया में कानूनी प्रावधानों का पालन किस सीमा तक अनिवार्य है।
परिवहन व्यवस्था पर पड़ सकता है व्यापक असर
राज्य परिवहन प्राधिकरण केवल बस परमिट जारी करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रदेश की सार्वजनिक परिवहन नीति, रूट स्वीकृति, यात्री परिवहन व्यवस्था और कई महत्वपूर्ण निर्णयों का केंद्र है। ऐसे में इसके पुनर्गठन को लेकर उत्पन्न विवाद का असर पूरे परिवहन क्षेत्र पर पड़ सकता है।
अब सभी की नजर हाईकोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी है, जहां सरकार अपनी संशोधित स्थिति और कानूनी पक्ष प्रस्तुत करेगी। तब तक राज्य परिवहन प्राधिकरण के पुनर्गठन पर लगी रोक बरकरार रहेगी और सरकार को अदालत के समक्ष यह स्पष्ट करना होगा कि प्रस्तावित बदलाव कानून के अनुरूप हैं या नहीं।
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस