CMHO पर गिरी गाज- जबलपुर में स्वास्थ्य विभाग का बड़ा घोटाला,₹1.75 करोड़ डकार गए अफसर

जबलपुर में स्वास्थ्य विभाग में 1.74 करोड़ रुपये के वित्तीय घोटाले का मामला सामने आया है. सीएमएचओ डॉ. संजय मिश्रा को निलंबित कर दिया गया है। जांच में पाया गया कि बिना सामग्री आपूर्ति के ही भुगतान कर दिया गया था.

CMHO पर गिरी गाज- जबलपुर में स्वास्थ्य विभाग का बड़ा घोटाला,₹1.75 करोड़ डकार गए अफसर

संजीवनी क्लीनिक घोटाला: जबलपुर में कागजों में इलाज, जमीनी हकीकत में खाली सिस्टम

मध्य प्रदेश सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी योजना 'मुख्यमंत्री संजीवनी क्लीनिक' में जबलपुर में एक बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया

मध्य प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी ‘मुख्यमंत्री संजीवनी क्लीनिक’ योजना में Jabalpur से बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। गरीबों को घर के पास मुफ्त इलाज देने वाली इस योजना को अधिकारियों ने कथित तौर पर भ्रष्टाचार का जरिया बना दिया।

कलेक्टर Raghavendra Singh के निर्देश पर डिप्टी कलेक्टर R.S. Maravi की टीम ने जब क्लीनिकों की जांच की, तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। जांच में पाया गया कि बिना किसी सामग्री की वास्तविक खरीद के ही करीब 1.75 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया गया।

जांच शुरू होने के महज तीन दिन पहले ही कुछ क्लीनिकों में आनन-फानन में प्रिंटर भेजे गए, जबकि अधिकांश केंद्रों पर कंप्यूटर तक उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि बिना कंप्यूटर के प्रिंटर का उपयोग कैसे किया जाता।

क्लीनिकों की मरम्मत और पुताई के नाम पर लाखों रुपये खर्च दिखाए गए, लेकिन हकीकत में पिछले दो वर्षों से कई केंद्रों में रंगाई-पुताई तक नहीं हुई। दीवारों की हालत जर्जर पाई गई, जिससे साफ है कि कागजों में काम दिखाकर राशि निकाली गई।

डिप्टी कलेक्टर की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट के अनुसार करीब 93 लाख रुपये की सामग्री का कोई पता नहीं चला। यह सामान न तो सरकारी स्टोर में मिला और न ही क्लीनिकों में। भंडार शाखा के रजिस्टर में फर्जी एंट्रियां दर्ज होने की बात भी सामने आई है। कई क्लीनिकों में अलमारियां तक नहीं मिलीं, जबकि उनके भुगतान पहले ही किए जा चुके हैं।

जांच में यह भी सामने आया कि 13 फर्जी बिलों के जरिए ऐसी सामग्री का भुगतान किया गया, जो कभी खरीदी ही नहीं गई। इन बिलों के माध्यम से 1.75 करोड़ रुपये से अधिक की राशि अलग-अलग फर्मों को जारी की गई। वहीं पुताई और मेंटेनेंस के नाम पर भी लाखों रुपये निकाल लिए गए, जबकि जमीन पर कोई काम नहीं हुआ।

बीपी मशीन, ग्लूकोज मशीन, हीमोग्लोबिनोमीटर और वजन मशीन जैसे जरूरी उपकरण केवल कागजों में खरीदे गए, लेकिन क्लीनिकों तक नहीं पहुंचे। जांच टीम के पहुंचने से पहले अधिकारियों द्वारा जल्दबाजी में कुछ जगह प्रिंटर भेजना भी संदेह को और गहरा करता है।

गोरैया घाट क्लीनिक में पदस्थ मेडिकल ऑफिसर Dr. Soumya Agrawal ने बताया कि वे पिछले दो वर्षों से अपने निजी टैबलेट के जरिए मरीजों का रजिस्ट्रेशन कर रही हैं। उन्होंने बताया कि बीपी मशीन और अन्य जरूरी उपकरणों की मांग लंबे समय से की जा रही थी, लेकिन अब जांच शुरू होने के बाद ही कुछ सामग्री पहुंचाई जा रही है।

जबलपुर में करीब 50 संजीवनी क्लीनिक संचालित हैं, लेकिन अधिकांश केंद्रों पर बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। कंप्यूटर, मेडिकल उपकरण और अन्य जरूरी संसाधनों की कमी के बावजूद रिकॉर्ड में करोड़ों रुपये खर्च दिखाए गए हैं।

डिप्टी कलेक्टर की रिपोर्ट में अब तक 93 लाख रुपये की गड़बड़ी प्रमाणित हो चुकी है, लेकिन यदि वर्ष 2021 से अब तक की फाइलों की गहराई से जांच की जाती है, तो यह घोटाला 10 करोड़ रुपये से अधिक तक पहुंच सकता है। सूत्रों के अनुसार मामले में भोपाल स्तर तक के कुछ अधिकारियों की संलिप्तता भी संदिग्ध मानी जा रही है।

इस पूरे मामले में मुख्य आरोपी माने जा रहे CMHO Dr. Sanjay Mishra को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। इसके अलावा जिला कार्यक्रम प्रबंधन इकाई के अधिकारियों को हटाया गया है, एक फार्मासिस्ट को निलंबित किया गया है और संविदा फार्मासिस्ट के खिलाफ भी कार्रवाई की गई है।

यह घोटाला न केवल वित्तीय अनियमितता का मामला है, बल्कि उन गरीबों के अधिकारों पर सीधा आघात है, जिन्हें इस योजना के तहत मुफ्त और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिलनी थीं। जांच आगे बढ़ने के साथ इस मामले में और बड़े खुलासे और सख्त कार्रवाई की संभावना जताई जा रही है।

बिना कंप्यूटर हुई प्रिंटर की सप्लाई

डिप्टी कलेक्टर को डॉक्टरों ने बताया कि क्लिनिकों में दो साल से जरूरी सामान की किल्लत बनी हुई थी लेकिन जांच टीम के आने की भनक लगते ही महज दो दिन पहले आनन-फानन में सामान की सप्लाई की गई. इस हड़बड़ी में भ्रष्टाचार की पोल तब खुली, जब क्लिनिकों में प्रिंटर तो सप्लाई कर दिए गए लेकिन उन्हें चलाने के लिए वहां कंप्यूटर तक मौजूद नहीं हैं. बिना कंप्यूटर के प्रिंटर की इस बेतुकी सप्लाई ने अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं.

संजीवनी क्लिनिकों के निरीक्षण में गड़बड़ी

डिप्टी कलेक्टर रघुवीर सिंह मरावी ने बताया कि अब तक जिले के 30 से ज्यादा संजीवनी क्लिनिकों की जांच की जा चुकी है और लगभग हर जगह एक ही तरह का पैटर्न सामने आया है. जांच अधिकारी रघुवीर सिंह मरावी के सामने डॉक्टरों ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि कैसे सालों से वे बुनियादी सामान के लिए परेशान होते रहे जबकि कागजों पर सप्लाई और भुगतान का खेल चलता रहा. एक ओर जहां एक करोड़ रुपये से अधिक के फर्जी बिलों के मामले में तत्कालीन CMHO पहले ही सस्पेंड हो चुके हैं. वहीं अब इस अदृश्य पुताई और बिना कंप्यूटर वाले प्रिंटर के खुलासे ने विभाग के कई अन्य अधिकारियों की नींद उड़ा दी है. माना जा रहा है कि इस जांच रिपोर्ट के बाद कई और बड़े अफसरों और फर्मों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई होना तय है. फिलहाल जांच जारी है.