मोहन सरकार फिर ले रही 2800 करोड़ का कर्ज, नए वित्त वर्ष में उधारी 9200 करोड़ पार; सिंचाई, ऊर्जा और इंफ्रास्ट्रक्चर पर होगा खर्च

वित्त विभाग के अधिकारियों के अनुसार सरकार द्वारा लिया जा रहा 1600 करोड़ रु का पहला ऋण वर्ष 2034 तक की अवधि के लिए रहेगा. वहीं, दूसरा ऋण 1200 करोड़ रु का है, जिसकी अवधि साल 2048 तक यानी अगले 22 वर्षों के लिए लिया गया है. दोनों सिक्योरिटीज की नीलामी आरबीआई कराएगा और भुगतान प्रक्रिया 27 मई 2026 तक पूरी कर ली जाएगी.

मोहन सरकार फिर ले रही 2800 करोड़ का कर्ज, नए वित्त वर्ष में उधारी 9200 करोड़ पार; सिंचाई, ऊर्जा और इंफ्रास्ट्रक्चर पर होगा खर्च

मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार मई 2026 के अंत में RBI के जरिए ₹2800 करोड़ का नया कर्ज लेने जा रही है। चालू वित्त वर्ष 2026-27 में अब तक कुल कर्ज ₹9200 करोड़ हो चुका है। जानिए ब्याज दर और शर्तें।

भोपाल। मध्यप्रदेश सरकार ने एक बार फिर बाजार से कर्ज लेने का फैसला किया है। राज्य सरकार अब 2800 करोड़ रुपए का नया ऋण उठाने जा रही है, जिससे वित्त वर्ष 2026-27 की शुरुआत के महज शुरुआती महीनों में ही कुल उधारी का आंकड़ा 9200 करोड़ रुपए से अधिक पहुंच गया है। यह राशि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के माध्यम से बॉन्ड जारी कर जुटाई जाएगी। सरकार का कहना है कि इस धनराशि का उपयोग राज्य में विकास परियोजनाओं को गति देने के लिए किया जाएगा, जिसमें सिंचाई, ऊर्जा, कृषि और आधारभूत संरचना से जुड़े कार्य प्राथमिकता में रहेंगे।

राज्य सरकार द्वारा लगातार लिए जा रहे ऋण को लेकर राजनीतिक और आर्थिक दोनों स्तरों पर चर्चा तेज हो गई है। एक ओर सरकार इसे विकास के लिए आवश्यक निवेश बता रही है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष राज्य के बढ़ते ऋण भार पर सवाल खड़े कर रहा है।

दो हिस्सों में लिया जाएगा 2800 करोड़ का ऋण

वित्त विभाग की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार यह ऋण दो अलग-अलग हिस्सों में लिया जाएगा। पहली किस्त 1600 करोड़ रुपए की होगी, जबकि दूसरी किस्त 1200 करोड़ रुपए की होगी। दोनों ऋण मध्यप्रदेश राज्य विकास ऋण (State Development Loan) योजना के अंतर्गत लिए जा रहे हैं।

पहली किस्त यानी 1600 करोड़ रुपए पर सरकार को 7.64 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर चुकानी होगी। दूसरी ओर 1200 करोड़ रुपए के ऋण पर 7.83 प्रतिशत ब्याज दर निर्धारित की गई है। इन दोनों ऋणों की प्रक्रिया आरबीआई द्वारा बॉन्ड जारी कर पूरी की जाएगी।

सरकार का मानना है कि विकास कार्यों के लिए पूंजीगत निवेश बनाए रखने के लिए बाजार से ऋण लेना जरूरी है। इसी नीति के तहत राज्य सरकार चरणबद्ध तरीके से वित्तीय संसाधन जुटा रही है।

अलग-अलग अवधि के लिए तय हुई ऋण अदायगी

सरकार द्वारा लिए जा रहे दोनों ऋणों की अवधि भी अलग-अलग रखी गई है। पहला ऋण वर्ष 2034 तक के लिए होगा, यानी इसकी अवधि अपेक्षाकृत कम रहेगी। वहीं दूसरा ऋण वर्ष 2048 तक के लिए लिया गया है, जो लंबी अवधि का कर्ज माना जा रहा है।

दोनों ऋणों की अदायगी छह-छह महीने के अंतराल पर की जाएगी। भुगतान अप्रैल और अक्टूबर में निर्धारित किस्तों के माध्यम से होगा। आरबीआई सिक्योरिटी नीलामी प्रक्रिया के जरिए इन बॉन्डों को जारी करेगा और पूरी वित्तीय प्रक्रिया को संपन्न कराएगा।

सरकारी दस्तावेजों के अनुसार ऋण प्रक्रिया 27 मई 2026 तक पूरी होने की संभावना जताई गई है।

नए वित्त वर्ष में तेजी से बढ़ा कर्ज का आंकड़ा

वित्त वर्ष 2026-27 की शुरुआत से ही राज्य सरकार लगातार बाजार से ऋण ले रही है। अप्रैल महीने में सरकार ने दो अलग-अलग चरणों में कुल चार किस्तों के माध्यम से 4600 करोड़ रुपए का ऋण लिया था।

इसके बाद मई महीने में सरकार ने 1800 करोड़ रुपए का अतिरिक्त कर्ज उठाया। अब 2800 करोड़ रुपए के नए ऋण को जोड़ने के बाद कुल उधारी का आंकड़ा 9200 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि वित्त वर्ष के शुरुआती दो महीनों में ही इतनी बड़ी उधारी यह संकेत देती है कि सरकार विकास योजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश की तैयारी में है।

हालांकि, इसके साथ यह सवाल भी उठ रहा है कि आने वाले वर्षों में बढ़ते ऋण और ब्याज भुगतान का असर राज्य के वित्तीय संतुलन पर कितना पड़ेगा।

विकास परियोजनाओं को मिलेगा वित्तीय समर्थन

राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह ऋण सामान्य राजस्व खर्चों के लिए नहीं बल्कि विकास योजनाओं में निवेश के लिए लिया जा रहा है।

सरकार के अनुसार प्राप्त राशि को मुख्य रूप से निम्न क्षेत्रों में खर्च किया जाएगा—

सिंचाई परियोजनाओं के विस्तार पर

ऊर्जा क्षेत्र की नई योजनाओं पर

कृषि अधोसंरचना विकास पर

सड़कों, पुलों और अन्य आधारभूत ढांचों के निर्माण पर

ग्रामीण और शहरी विकास परियोजनाओं पर

मध्यप्रदेश सरकार पिछले कुछ वर्षों से सिंचाई क्षमता बढ़ाने, बिजली व्यवस्था मजबूत करने और सड़क नेटवर्क विस्तार को प्राथमिकता देती रही है। ऐसे में माना जा रहा है कि नई उधारी का बड़ा हिस्सा इन्हीं परियोजनाओं में लगाया जा सकता है।

राजस्व और व्यय का बड़ा दायरा

राजपत्र में जारी अनुमानित आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में प्रदेश की कुल राजस्व प्राप्ति और व्यय लगभग 2.79 लाख करोड़ रुपए रहने का अनुमान है।

इतने बड़े बजट आकार के बीच राज्य सरकार विकास योजनाओं की गति बनाए रखने के लिए ऋण आधारित वित्तीय व्यवस्था अपना रही है। सरकार का तर्क है कि यदि पूंजीगत व्यय बढ़ता है तो उसका सीधा प्रभाव आर्थिक गतिविधियों, रोजगार और निवेश पर पड़ता है।

वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार यदि ऋण का उपयोग उत्पादक परिसंपत्तियों के निर्माण में किया जाता है, तो उसका दीर्घकालीन लाभ राज्य की अर्थव्यवस्था को मिल सकता है। लेकिन यदि ऋण भार लगातार बढ़ता रहा और राजस्व वृद्धि उसी अनुपात में नहीं हुई, तो भविष्य में ब्याज भुगतान का दबाव बढ़ सकता है।

विपक्ष ने उठाए सवाल

राज्य सरकार की बढ़ती उधारी को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है। विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि पहले लिए गए ऋणों का उपयोग किन परियोजनाओं में हुआ और उनका वास्तविक लाभ कितना मिला।

विपक्ष यह भी तर्क दे रहा है कि बढ़ते ऋण से भविष्य में राज्य की वित्तीय स्थिति पर असर पड़ सकता है और आने वाली सरकारों पर भी उसका भार पड़ेगा।

हालांकि सरकार का कहना है कि यह ऋण विकासोन्मुख निवेश के लिए लिया जा रहा है और इससे प्रदेश के दीर्घकालीन विकास को गति मिलेगी।

विकास बनाम ऋण का संतुलन बड़ी चुनौती

मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्य में लगातार बढ़ती आबादी, कृषि विस्तार, सिंचाई परियोजनाएं, ऊर्जा जरूरतें और आधारभूत संरचना निर्माण के लिए भारी वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है। ऐसे में सरकारें अक्सर बाजार से ऋण लेकर विकास कार्यों को गति देती हैं।

लेकिन चुनौती यह होती है कि विकास और ऋण प्रबंधन के बीच संतुलन बना रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऋण से बनने वाली परियोजनाएं आर्थिक लाभ उत्पन्न करती हैं, तो यह निवेश भविष्य में राज्य के लिए लाभकारी साबित हो सकता है।

फिलहाल मोहन सरकार द्वारा 2800 करोड़ रुपए का नया ऋण लेने के फैसले ने प्रदेश की आर्थिक और राजनीतिक चर्चा को एक बार फिर तेज कर दिया है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि यह राशि किन परियोजनाओं में खर्च होती है और इसका प्रदेश के विकास पर कितना प्रभाव पड़ता है।