नोटिफिकेशन की चूक से हिली 395 निकाय अध्यक्षों की कुर्सी: 98 नपा-297 नगर परिषद अध्यक्षों के वित्तीय अधिकार खतरे में

मध्य प्रदेश की नगर पालिका और नगर परिषदों के अध्यक्ष के वित्तीय अधिकार शून्य घोषित होने का खतरा है। ये अध्यक्ष वर्ष 2022 और उसके बाद हुए चुनाव के बाद चुने गए थे और सरकार ने इनके निर्वाचन का नोटिफिकेशन नहीं किया था।

नोटिफिकेशन की चूक से हिली 395 निकाय अध्यक्षों की कुर्सी: 98 नपा-297 नगर परिषद अध्यक्षों के वित्तीय अधिकार खतरे में

प्रदेश में वर्ष 2022 के बाद चुने गए कई नगर पालिका और नगर परिषद अध्यक्षों के वित्तीय अधिकार खतरे में हैं। अदालतों में चल रहे मामलों के कारण दो निकाय अध्यक्षों के वित्तीय अधिकार खत्म किए जा चुके हैं।

भोपाल। मध्य प्रदेश में कई नगर पालिकाओं और नगर परिषदों के अध्यक्षों के अधिकारों पर बड़ा कानूनी संकट खड़ा हो गया है। वर्ष 2022 के बाद हुए नगरीय निकाय चुनावों में पार्षदों द्वारा चुने गए कई अध्यक्षों के वित्तीय अधिकार शून्य घोषित होने का खतरा पैदा हो गया है। बताया जा रहा है कि इन अध्यक्षों के चुनाव के बाद राज्य सरकार द्वारा उनका औपचारिक नोटिफिकेशन जारी नहीं किया गया था।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यदि यही स्थिति बनी रही तो प्रदेश के करीब 395 नगर निकाय अध्यक्षों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। इनमें 98 नगर पालिकाओं और 297 नगर परिषदों के अध्यक्ष शामिल हैं।

दो निकायों में पहले ही खत्म हो चुके हैं वित्तीय अधिकार

अब तक श्योपुर नगर पालिका और पानसेमल नगर परिषद के अध्यक्षों के वित्तीय अधिकार समाप्त किए जा चुके हैं। अदालत के आदेश के बाद इन निकायों में अध्यक्ष के वित्तीय अधिकार शून्य मान लिए गए हैं और प्रशासनिक जिम्मेदारी सीएमओ या एसडीएम को सौंप दी गई है।

इसी तरह डबरा नगर पालिका से जुड़ा मामला फिलहाल न्यायालय में लंबित है। अदालत ने सुनवाई के दौरान यह माना है कि जब तक विधिवत नोटिफिकेशन जारी नहीं होता, तब तक ऐसे अध्यक्षों को पूरी तरह वैधानिक रूप से निर्वाचित नहीं माना जा सकता।

ओबीसी आरक्षण विवाद से जुड़ा है मामला

यह पूरा विवाद उस समय से जुड़ा है जब निकाय चुनाव में ओबीसी वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया था। इसके बाद राज्य निर्वाचन आयोग को जल्दबाजी में नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव कराना पड़े थे।

उस समय नगर निगमों में महापौर का चुनाव सीधे जनता द्वारा, जबकि नगर पालिका और नगर परिषद अध्यक्षों का चुनाव पार्षदों के माध्यम से कराया गया था। यानी जनता ने सीधे अध्यक्ष नहीं चुना, बल्कि चुने हुए पार्षदों ने अपने बीच से अध्यक्ष का चुनाव किया।

नोटिफिकेशन नहीं होने से खड़ा हुआ विवाद

चुनाव के बाद नगर निगमों के महापौर और पार्षदों के परिणामों का औपचारिक नोटिफिकेशन जारी कर दिया गया था। इसी तरह नगर पालिका और नगर परिषद के पार्षदों के परिणाम भी घोषित किए गए थे।

लेकिन पार्षदों द्वारा चुने गए अध्यक्षों का औपचारिक नोटिफिकेशन नगरीय विकास एवं आवास विभाग द्वारा जारी नहीं किया गया। यही वजह है कि अब अदालतों में यह सवाल उठ रहा है कि यदि सरकार ने चुनाव परिणाम का विधिवत प्रकाशन नहीं किया, तो क्या ऐसे अध्यक्षों को पूर्ण अधिकार मिल सकते हैं।

पानसेमल मामले से शुरू हुआ विवाद

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह विवाद सबसे पहले इंदौर जिले की पानसेमल नगर परिषद से जुड़े मामले के सामने आने के बाद चर्चा में आया। यहां एक पार्षद ने अध्यक्ष के चुनाव को चुनौती देते हुए जिला न्यायालय में याचिका दायर की थी।

अदालत ने राज्य सरकार से पूछा कि क्या अध्यक्ष के चुनाव का आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी किया गया है। सरकार इस संबंध में स्पष्ट जवाब नहीं दे सकी। इसके बाद अदालत ने टिप्पणी की कि नोटिफिकेशन के अभाव में अध्यक्ष के वित्तीय अधिकार वैध नहीं माने जा सकते।

हाईकोर्ट ने भी आदेश को सही माना

पानसेमल मामले में जिला अदालत के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की गई थी। लेकिन वहां भी सरकार ठोस दस्तावेज पेश नहीं कर सकी। परिणामस्वरूप हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखते हुए यह माना कि नोटिफिकेशन न होने के कारण अध्यक्ष के अधिकार सीमित हो सकते हैं। इसी तरह श्योपुर नगर पालिका के अध्यक्ष पद से जुड़े विवाद में भी अदालत ने हस्तक्षेप किया। एक व्यक्ति द्वारा चुनाव को चुनौती देने के बाद अदालत ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए अध्यक्ष रेणु गर्ग को पद के अधिकारों का उपयोग करने से रोक दिया था।

आगे और भी बढ़ सकता है यह विवाद

राज्य सरकार ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में अपील की थी, लेकिन अदालत ने सरकार की दलीलों को स्वीकार नहीं किया और पहले दिए गए आदेश को ही बरकरार रखा। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इसी आधार पर अन्य निकायों में भी शिकायतें दर्ज होती हैं, तो प्रदेश के कई नगर पालिका और नगर परिषद अध्यक्षों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। इससे स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था और विकास कार्यों पर भी असर पड़ने की संभावना है। यह मामला पूरे प्रदेश की नगर पालिकाओं और नगर परिषदों की प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है।