8 करोड़ का बीमा घोटाला: सरपंच-सचिव और ICICI एजेंट की मिलीभगत, मृत लोगों के नाम पॉलिसी; 21 नॉमिनी समेत 40 आरोपी पर केस

उज्जैन स्थित आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) ने गुरुवार को ICICI प्रूडेंशियल लाइफ इंश्योरेंस से जुड़े करीब 8 करोड़ रुपए के बीमा घोटाले का बड़ा खुलासा किया

8 करोड़ का बीमा घोटाला: सरपंच-सचिव और ICICI एजेंट की मिलीभगत, मृत लोगों के नाम पॉलिसी; 21 नॉमिनी समेत 40 आरोपी पर केस

मृत और बीमार लोगों के नाम पर ली गई फर्जी बीमा पॉलिसियां

पंचायत स्तर तक फैली मिलीभगत, सरपंच-सचिव की भूमिका उजागर

बीमा एजेंटों ने नियमों को दरकिनार कर करवाईं पॉलिसियां

27 पॉलिसियों में गड़बड़ी, 8 मामलों में मृत व्यक्तियों के नाम का इस्तेमाल

मध्य प्रदेश के उज्जैन से एक बड़े और संगठित बीमा घोटाले का पर्दाफाश हुआ है, जिसने ग्रामीण स्तर पर प्रशासनिक और निजी संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) ने ICICI प्रूडेंशियल लाइफ इंश्योरेंस से जुड़े करीब 8 करोड़ रुपए के बीमा घोटाले का खुलासा किया है। इस मामले में सरपंच, सचिव, बीमा एजेंट और नॉमिनी समेत कुल 40 लोगों को आरोपी बनाया गया है।

कैसे सामने आया घोटाला

इस घोटाले की शुरुआत 3 सितंबर 2025 को मिली एक शिकायत से हुई, जिसमें आरोप लगाया गया था कि मृत व्यक्तियों के नाम पर बीमा पॉलिसियां जारी की जा रही हैं और उनके नाम पर फर्जी क्लेम लिया जा रहा है। शिकायत के आधार पर EOW की मंदसौर-उज्जैन इकाई ने जांच शुरू की।

जांच में जो तथ्य सामने आए, वे चौंकाने वाले थे। आरोपियों ने पहले से बीमार या मृत लोगों के नाम पर बीमा पॉलिसियां जारी करवाईं। इसके बाद फर्जी दस्तावेजों के जरिए मृत्यु प्रमाण पत्र तैयार किए गए और बीमा कंपनी में क्लेम लगाया गया। कई मामलों में तो मृत व्यक्ति को “जिंदा” दिखाकर पॉलिसी ली गई और फिर कुछ समय बाद उसकी “मौत” दिखाकर क्लेम हासिल करने की कोशिश की गई।

पंचायत स्तर तक फैला नेटवर्क

इस पूरे घोटाले की सबसे गंभीर बात यह है कि इसमें पंचायत स्तर तक की मिलीभगत सामने आई है। जांच में पाया गया कि ग्राम पंचायतों के सरपंच, सचिव और सहायक सचिव ने फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

महिदपुर क्षेत्र के ग्राम आलाखेड़ा के सरपंच जसवंत सिंह, सचिव राजकुमार देवड़ा और सहायक सचिव राधेश्याम गुर्जर के अलावा ग्राम पंचायत पालखंदा और धुरेरी के सचिवों को भी आरोपी बनाया गया है। इन लोगों ने सरकारी पद का दुरुपयोग करते हुए गलत दस्तावेज तैयार किए और बीमा क्लेम को वैध दिखाने में मदद की।

बीमा एजेंटों की भूमिका

इस घोटाले में बीमा एजेंटों की भूमिका भी बेहद अहम रही। जांच में सामने आया कि कई एजेंटों ने जानबूझकर नियमों की अनदेखी करते हुए पॉलिसियां जारी करवाईं। उन्होंने न सिर्फ फर्जी दस्तावेज स्वीकार किए, बल्कि कई मामलों में खुद ही दस्तावेज तैयार करने में मदद की।

EOW ने जिन प्रमुख एजेंटों और संबंधित लोगों को आरोपी बनाया है, उनमें मेघा डोंगांरवर, ऋषि पाल, जशोदाबेन शर्मा, महेशचंद्र, मुकेश साधवानी, सुनीता, जितेंद्र खिंची, महेंद्र परिहार, अंजली जैन, प्रहलाद चौहान, मेघा कोठारी, रवि राठौर और प्रहलाद पाटीदार शामिल हैं। इसके अलावा झोपर इंश्योरेंस ब्रोकर्स प्राइवेट लिमिटेड का नाम भी इस मामले में सामने आया है।

27 पॉलिसियों में मिली गड़बड़ी

जांच के दौरान कुल 27 बीमा पॉलिसियों की जांच की गई, जिनमें गंभीर अनियमितताएं पाई गईं:

19 मामलों में पॉलिसी लेते समय बीमारी की जानकारी छुपाई गई

8 मामलों में मृत व्यक्तियों के नाम पर पॉलिसी जारी की गई

इन सभी मामलों में बाद में बीमा क्लेम के लिए आवेदन किया गया, जिससे कंपनी को करोड़ों रुपए का नुकसान पहुंचाने की साजिश रची गई।

21 नॉमिनी भी बने आरोपी

इस घोटाले में सिर्फ एजेंट और पंचायत अधिकारी ही नहीं, बल्कि पॉलिसी के नॉमिनी भी शामिल पाए गए। EOW ने 21 नॉमिनी को आरोपी बनाया है, जिन्होंने फर्जी क्लेम लेने में सक्रिय भूमिका निभाई।

इनमें रामकन्या नवरंग, सरे कुंवर, गोकुल सिंह, अनिल, रेखा बाई, मुकेश सिंह चौहान, राधा मालवीय, गोपाल, प्रभा पाटीदार, अनिल भाटी, दिलीप गावरिया, विनोद, कैलाश हिरवे, शीतल, श्यामदास बैरागी, मुन्नी यादव, सुरेश जुझारे, मंजुदेवी राव, राधा देवी, सरफराज अहमद, सुधीर राठौर और ज्योति बाई शामिल हैं।

किन धाराओं में मामला दर्ज

सभी आरोपियों के खिलाफ गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया गया है, जिनमें शामिल हैं:

धारा 417 (धोखाधड़ी)

धारा 420/511 (धोखाधड़ी का प्रयास)

धारा 467 (जालसाजी)

धारा 468 (फर्जी दस्तावेज तैयार करना)

धारा 471 (फर्जी दस्तावेज का उपयोग)

धारा 120बी (आपराधिक साजिश)

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988

इन धाराओं के तहत दोषी पाए जाने पर आरोपियों को लंबी सजा और भारी जुर्माना हो सकता है।

जांच टीम की भूमिका

इस पूरे मामले का खुलासा EOW की एक विशेष टीम ने किया। टीम में इंस्पेक्टर रीमा यादव, एएसआई अशोक राव, प्रधान आरक्षक विशाल बादल, मोहन पाल, लोकेन्द्र देवड़ा और आरक्षक राकेश जटिया शामिल थे। इन अधिकारियों ने तकनीकी और दस्तावेजी जांच के जरिए पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश किया।

बीमा प्रणाली पर सवाल

इस घोटाले ने बीमा कंपनियों की वेरिफिकेशन प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। इतनी बड़ी संख्या में फर्जी पॉलिसियां जारी होना यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं सिस्टम में खामियां हैं, जिनका फायदा उठाकर इस तरह की ठगी को अंजाम दिया गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि बीमा कंपनियों को अब अपनी जांच प्रक्रिया को और सख्त बनाना होगा, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में जहां दस्तावेजों की सत्यता की जांच चुनौतीपूर्ण होती है।

ग्रामीण प्रशासन की विश्वसनीयता पर असर

पंचायत स्तर के अधिकारियों की इस घोटाले में संलिप्तता ने ग्रामीण प्रशासन की साख को भी नुकसान पहुंचाया है। सरपंच और सचिव जैसे पदों पर बैठे लोगों से पारदर्शिता और ईमानदारी की अपेक्षा की जाती है, लेकिन इस मामले ने उस भरोसे को झटका दिया है।

आगे की कार्रवाई

EOW ने सभी आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है और आगे की जांच जारी है। संभावना है कि जांच के दौरान और भी नाम सामने आ सकते हैं। साथ ही, जिन मामलों में बीमा राशि का भुगतान हो चुका है, वहां रिकवरी की कार्रवाई भी की जा सकती है।

उज्जैन का यह 8 करोड़ का बीमा घोटाला सिर्फ एक वित्तीय अपराध नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक तंत्र, निजी कंपनियों और स्थानीय स्तर पर फैले भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें उजागर करता है। इस मामले ने यह साफ कर दिया है कि यदि निगरानी तंत्र मजबूत न हो, तो संगठित तरीके से बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी संभव है।

अब सभी की नजर इस बात पर है कि जांच कितनी तेजी और पारदर्शिता से आगे बढ़ती है और दोषियों को कब तक सजा मिलती है।