दीपावली: भगवान महावीर का निर्वाण, गौतमस्वामी का केवलज्ञान और आत्मज्योति का पर्व :  चम्पालाल नानकदास बोथरा (जैन)सूरत

महावीर स्वामी ने अपने उपदेशों में रत्नत्रय (सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, और सम्यक् चारित्र) के मार्ग से ही आत्मा की मुक्ति का मार्ग बताया। उनका संदेश आज के समाज के लिए प्रकाशस्तंभ है

दीपावली: भगवान महावीर का निर्वाण, गौतमस्वामी का केवलज्ञान और आत्मज्योति का पर्व :   चम्पालाल नानकदास बोथरा (जैन)सूरत

 भगवान महावीर, वर्धमान, वीर, अतिवीर और सन्मति के नाम से भी जाने जाते हैं, वर्तमान अवसर्पिणी काल के चौबीसवें और अंतिम तीर्थंकर थे।

सूरत,दीपावली, जिसे संपूर्ण भारत में प्रकाश, समृद्धि और आनंद के पर्व के रूप में मनाया जाता है, जैन दर्शन में आत्म-शुद्धि, मोक्ष और ज्ञान की सर्वोच्च उपलब्धि का अत्यंत गहन आध्यात्मिक अर्थ रखती है। यह केवल एक लोक पर्व नहीं, बल्कि एक धार्मिक अनुष्ठान है, जो हमें इस युग के अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के शाश्वत संदेश से जोड़ता है।

जब अधिकांश लोग इस दिन श्रीराम के अयोध्या आगमन का उत्सव मनाते हैं, तब जैन परंपरा में यह दिन मोक्ष, ज्ञान और आत्मप्रकाश का प्रतीक है — क्योंकि इसी कार्तिक मास की अमावस्या की रात्रि को भगवान महावीर स्वामी जी ने निर्वाण प्राप्त किया था और उनके प्रथम गणधर गौतमस्वामी को केवलज्ञान की प्राप्ति हुई थी। यह पर्व जैन वीर निर्वाण संवत् के प्रारंभ का भी सूचक है।

 भगवान महावीर स्वामी का निर्वाण: आत्मा की अंतिम विजय (निर्वाण कल्याणक)

भगवान महावीर, वर्धमान, वीर, अतिवीर और सन्मति के नाम से भी जाने जाते हैं, वर्तमान अवसर्पिणी काल के चौबीसवें और अंतिम तीर्थंकर थे।

समय और स्थान का आगमिक उल्लेख:

जैन परंपरा और आगमों के अनुसार, ई.पू. 527 में, कार्तिक मास की अमावस्या की रात्रि (अधिकांशतः कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी का अंतिम प्रहर और अमावस्या का मध्य काल), पावापुरी (बिहार) स्थित जल मंदिर में, भगवान महावीर स्वामी जी ने बहत्तर (72) वर्ष की आयु में, सोलह प्रहर तक अंतिम उपदेश देने के पश्चात्, देह का पूर्णतः परित्याग किया और मोक्षधाम (सिद्धशिला) को प्राप्त हुए।

जैन दर्शन में ‘निर्वाण’ का अर्थ है, जन्म-मरण के चक्र से पूर्ण मुक्ति, जहाँ आत्मा अनंत ज्ञान, आनंद और शांति की अवस्था को प्राप्त करती है।

इस क्षण को जैन धर्म में “निर्वाण कल्याणक” कहा गया — जब आत्मा आठों कर्मबंधन (ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अंतराय) से सदैव के लिए मुक्त होकर, अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत आनंद और अनंत शक्ति से युक्त सिद्ध अवस्था को प्राप्त हुई।

आचार्य जिनसेन द्वारा रचित हरिवंश पुराण के एक श्लोक में दीपावली के प्राचीनतम उल्लेख का वर्णन है:

"ततस्तुः लोकः प्रतिवर्षमादरत् प्रसिद्धदीपलिकयात्र भारते।

समुद्यतः पूजयितुं जिनेश्वरं जिनेन्द्र-निर्वाण विभूति-भक्तिभाक्।।"

(अर्थात्, उस समय के बाद से, भारत के लोग जिनेन्द्र (महावीर) के निर्वाणोत्सव पर उनकी पूजा करने के लिए प्रसिद्ध त्यौहार "दीपलिक" (दीपों की पंक्ति) मनाते हैं, जो जिनेन्द्र के निर्वाण की महिमा में भक्ति से प्रेरित है।)

निर्वाण के प्रतीक और जैन मान्यताएं:

1. निर्वाण लाडू (मोक्ष लाडू): निर्वाण के दिन जैन मंदिरों में विशेष रूप से निर्वाण लाडू चढ़ाया जाता है। यह लाडू गोल और अखंड होता है, जो आत्मा की अखंडता और मोक्ष की अनंतता का प्रतीक है। इसे चावल, घी और शक्कर से बनाया जाता है, जिसका अर्थ है कि आत्मा को भी तपश्चरण (तपने) की आग में तपकर ही मोक्षरूपी मधुरता प्राप्त होती है।

2. दीप प्रज्वलन की परंपरा: जब भगवान महावीर ने देह त्यागा, तब अंतिम ज्ञानसूर्य अस्त होने से सर्वत्र अंधकार छा गया। तभी देवों और अनेक राजाओं ने पावापुरी को प्रकाशित करने के लिए दिव्य दीप प्रज्ज्वलित किए। इसी घटना को स्मरण करते हुए, जैन श्रद्धालु 'ज्ञान के दीपक' जलाते हैं, ताकि यह संदेश बना रहे कि भौतिक प्रकाश से अधिक आवश्यक आत्म-ज्ञान का प्रकाश है।

3. वीर निर्वाण संवत् का प्रारंभ: भगवान महावीर के निर्वाण के अगले दिन, कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से, जैन समाज में एक नए युग "वीर निर्वाण संवत्" का प्रारंभ माना जाता है। यह पर्व जैन नव वर्ष का प्रवेश द्वार भी है, जो आत्म-शुद्धि के संकल्प के साथ शुरू होता है।

गौतमस्वामी का केवलज्ञान: अज्ञान से ज्ञान की ओर (केवलज्ञान कल्याणक)

भगवान महावीर के निर्वाण के समय समस्त जैन संघ का दायित्व उनके प्रथम गणधर इंद्रभूति गौतम के कंधों पर था।

गौतमस्वामी प्रारंभ में एक उच्च कोटि के वैदिक विद्वान थे, जिन्होंने महावीर के उपदेश सुनकर जैनेश्वरी दीक्षा ली। गणधर होने पर उन्हें चार ज्ञान (मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान और मनःपर्यय ज्ञान) की प्राप्ति हुई थी, परंतु वे केवलज्ञान (पूर्ण ज्ञान) से दूर थे। इसका एकमात्र कारण गुरु महावीर के प्रति उनका तीव्र ‘मोह’ था, जो उन्हें अंतिम कर्म (मोहनीय कर्म) के क्षय से रोक रहा था।

जैसे ही भगवान महावीर मोक्ष गए, गौतमस्वामी को तीव्र वैराग्य और आत्मबोध हुआ। मोह का यह बंधन टूटते ही, उसी गोधूली वेला में, उन्हें केवलज्ञान (पूर्ण और अनंत ज्ञान) प्राप्त हुआ। इस दिन उन्हें 'केवलज्ञान रूपी सरस्वती' की प्राप्ति हुई।

यह घटना इस बात का प्रतीक है कि:

"जब भक्ति, वैराग्य और आत्म-ज्ञान का संगम होता है, तभी सच्ची आत्मज्योति प्रकट होती है और कर्मों का अंधकार छंट जाता है।"

गौतम गणधर और केवलज्ञान की स्तुति:

केवलज्ञान प्राप्त करने के बाद, गौतम गणधर ने बारह वर्ष तक केवली अवस्था में विचरण किया। केवलज्ञान की प्राप्ति के पश्चात् ही उन्होंने भगवान महावीर की स्तुति में प्रमुख चैत्यभक्ति (पूजा-स्तुति) की रचना की। इस स्तुति में उन्होंने गुरु के प्रति असीम श्रद्धा व्यक्त करते हुए आत्म-शुद्धि के मार्ग को दर्शाया।

 दीपावली का जैन दृष्टिकोण: आत्मप्रकाश, तप और संयम का पर्व

जैन धर्म में दीपावली का मुख्य उद्देश्य केवल बाहरी दीपों का नहीं, बल्कि अंतर्मन की ज्योति प्रज्वलित करना है, जिसे आगमों में ‘दीप मालिका’ कहा गया है।

जैन आगमों के आलोक में पूजन विधि:

जैन धर्मावलंबी दीपावली को अत्यंत संयम और तपस्या से मनाते हैं:

1. निर्वाण पूजा और निर्वाण काण्ड: प्रातःकाल जिनालयों में भगवान महावीर का निर्वाण कल्याणक महोत्सव मनाया जाता है। निर्वाण काण्ड का पाठ किया जाता है, और प्रभु को निर्वाण लाडू के साथ अर्घ्य समर्पित किया जाता है।

2. सोलह कारण भावना और दीप प्रज्वलन: जैन परंपरा में, गोधूली वेला में घर या मंदिर में सोलह दीपक जलाए जाते हैं। ये सोलह दीपक उन सोलह कारण भावनाओं के प्रतीक हैं, जिन्हें भाकर आत्मा तीर्थंकर प्रकृति का बंध करती है। यह प्रकाश हमें मोह, राग और द्वेष रूपी अंधकार से मुक्ति का मार्ग दिखाता है।

3. मोक्ष लक्ष्मी-केवलज्ञान सरस्वती पूजन: जैन धर्म में लक्ष्मी का अर्थ निर्वाण (मोक्ष) और सरस्वती का अर्थ केवलज्ञान है। इसलिए इस दिन वीतराग देवों की पूजा की जाती है ताकि हमें मोक्ष लक्ष्मी और केवलज्ञान रूपी सरस्वती प्राप्त हो, न कि केवल धन की देवी की पूजा।

4. उपवास और रात्रि जागरण: अनेक श्रद्धालु इस दिन उपवास रखते हैं और रात भर णमोकार मंत्र या अन्य मंगल पाठों का जाप करते हुए रात्रि जागरण करते हैं, जिसे "ज्ञान दीप" प्रज्वलन कहते हैं।

 भगवान महावीर का शाश्वत संदेश: आत्म-धर्म का मूल

महावीर स्वामी ने अपने उपदेशों में रत्नत्रय (सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, और सम्यक् चारित्र) के मार्ग से ही आत्मा की मुक्ति का मार्ग बताया। उनका संदेश आज के समाज के लिए प्रकाशस्तंभ है:

1.अहिंसा (अपरिहार्य सिद्धांत): महावीर ने कहा:

"नैव हिंसति, नैव घातयति" — जो किसी को पीड़ा नहीं देता, वही सच्चा धर्मात्मा है।

"जीवो जीवस्य कारणं न भवेत्" (एक जीव दूसरे जीव का दुःख या बंधन का कारण न बने)

2.अनेकांतवाद (सत्य के अनेक पहलू): यह सिद्धांत हमें वैचारिक मतभेदों को समाप्त कर, सामंजस्य और सह-अस्तित्व सिखाता है।

3.आत्म-ज्ञान की महत्ता: महावीर का अंतिम उपदेश था:

"अप्पा सो परमप्पा" (यह आत्मा ही परमात्मा है)।

इसका अर्थ है कि प्रत्येक आत्मा में सिद्ध बनने की क्षमता है; हमें केवल अपने भीतर के राग, द्वेष, मोह, और अहंकार रूपी अंधकार को हटाना है।

निर्वाण, ज्ञान और महामांगलिक की परंपरा:-

जैन परंपरा की दीपावली — निर्वाण और केवलज्ञान की दीपावली — हमें स्मरण कराती है कि हर मनुष्य एक सिद्धत्व का बीज है। यह पर्व हमें बाहरी समृद्धि की जगह आंतरिक आत्म-ज्ञान की ओर मुड़ने का आह्वान करता है।

दीपावली के अगले दिन की मंगलमय परंपरा:

दीपावली की अगली सुबह कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से जैन वीर निर्वाण संवत् का नया वर्ष प्रारंभ होता है। इस शुभ अवसर पर जैन मंदिरो, उपाश्रयों में, साधु-भगवंत या त्यागी-वृंद, विशेष रूप से "महामांगलिक" सुनाते हैं। यह महामांगलिक एक प्रकार का शांति पाठ( गौतम रासा), आशीर्वाद और मंगल कामना होती है, जिसमें सभी जीवों के लिए शांति और धर्म मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी जाती है। इस महामांगलिक के साथ ही, श्रद्धालु नए वर्ष के लिए धर्ममय जीवन जीने का संकल्प लेते हैं।

जब हम मोहरूपी अंधकार को मिटाकर आत्मज्योति प्रज्वलित करते हैं, और महामांगलिक सुनकर मंगलमय वर्ष का प्रारंभ करते हैं, तभी सच्ची और आत्म-कल्याणकारी दीपावली होती है।