पाकिस्तानी साइबर नेटवर्क का भंडाफोड़: होटल से 4 एजेंट गिरफ्तार, क्रिप्टो ट्रेडिंग से विदेश भेजी जा रही थी ठगी की रकम

ग्वालियर क्राइम ब्रांच ने होटल एचजी से अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी गिरोह के चार एजेंट गिरफ्तार किए हैं। जांच में पाकिस्तान लिंक सामने आया है। आरोपी म्यूल खातों के जरिए ठगी की रकम ट्रांसफर कर डार्क वेब और क्रिप्टोकरेंसी के माध्यम से विदेश भेज रहे थे।

पाकिस्तानी साइबर नेटवर्क का भंडाफोड़: होटल से 4 एजेंट गिरफ्तार, क्रिप्टो ट्रेडिंग से विदेश भेजी जा रही थी ठगी की रकम

ग्वालियर पुलिस ने होटल से संचालित पाकिस्तानी साइबर ठगी नेटवर्क का भंडाफोड़ किया. मुरैना-धौलपुर के 4 एजेंट गिरफ्तार, भारी सामान जब्त. 

ग्वालियर में क्राइम ब्रांच ने एक बड़े अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी गिरोह का पर्दाफाश करते हुए चार एजेंटों को गिरफ्तार किया है। यह गिरोह शहर के पॉश इलाके कैलाश विहार स्थित होटल एचजी के एक कमरे को कंट्रोल रूम बनाकर देशभर में साइबर फ्रॉड का नेटवर्क संचालित कर रहा था। जांच में सबसे बड़ा खुलासा यह हुआ कि गिरोह के तार पाकिस्तान से जुड़े हुए हैं और वहां बैठे हैंडलर व्हाट्सएप कॉल के जरिए पूरे नेटवर्क को संचालित कर रहे थे।

शनिवार दोपहर क्राइम ब्रांच को मुखबिर से सूचना मिली थी कि होटल एचजी में कुछ संदिग्ध युवक लैपटॉप, मोबाइल फोन और कई बैंक दस्तावेजों के साथ रुके हुए हैं। सूचना मिलते ही पुलिस टीम ने होटल पर दबिश दी। कमरे की तलाशी के दौरान वहां से चार युवकों को गिरफ्तार किया गया। इनमें दो आरोपी ग्वालियर, एक मुरैना और एक राजस्थान के धौलपुर का निवासी बताया गया है।

पुलिस को मौके से बड़ी संख्या में मोबाइल फोन, सिम कार्ड, एटीएम कार्ड, बैंक पासबुक, चेकबुक और कई खातों से जुड़े दस्तावेज बरामद हुए हैं। शुरुआती जांच में यह सामने आया कि आरोपी देशभर में साइबर ठगी से जुड़े पैसों को इकट्ठा कर उन्हें अलग-अलग खातों में ट्रांसफर करवाते थे। बाद में यही रकम क्रिप्टो ट्रेडिंग और डार्क वेब के जरिए विदेश भेज दी जाती थी।

पाकिस्तान से ऑपरेट हो रहा था नेटवर्क

पूछताछ के दौरान आरोपियों के मोबाइल फोन से कई व्हाट्सएप कॉल और चैट डिटेल सामने आई हैं। इनमें पाकिस्तान के कंट्री कोड वाले नंबरों से लगातार संपर्क होने की जानकारी मिली है। पुलिस सूत्रों के अनुसार पाकिस्तान में बैठा एक हैंडलर पूरे नेटवर्क को निर्देश देता था कि किस खाते में पैसा मंगाना है और रकम को आगे कहां ट्रांसफर करना है।

आरोपियों ने खुलासा किया कि वे सीधे अपने बैंक खातों का इस्तेमाल नहीं करते थे। इसके बजाय वे गरीब, बेरोजगार या लालच में आए लोगों के बैंक खाते किराए पर लेते थे। इन खातों को ‘म्यूल अकाउंट’ कहा जाता है। साइबर ठगी की रकम पहले इन्हीं खातों में ट्रांसफर होती थी ताकि असली अपराधियों तक पुलिस आसानी से न पहुंच सके।

कैसे काम करता था गिरोह?

पुलिस जांच में पता चला है कि गिरोह बेहद शातिर तरीके से काम करता था। आरोपियों के मोबाइल में एक नंबर “बड़े भैया” नाम से सेव था। इसी नंबर से उन्हें निर्देश मिलते थे कि किस म्यूल अकाउंट में कितनी रकम आने वाली है और किस समय पैसा निकालना है।

जैसे ही ठगी की रकम खाते में आती थी, एजेंट अलग-अलग एटीएम बूथ पर पहुंचकर कैश निकाल लेते थे। इसके बाद रकम दूसरे एजेंटों को सौंप दी जाती थी। कई बार पैसे को तुरंत क्रिप्टोकरेंसी में बदलकर विदेशी नेटवर्क तक पहुंचा दिया जाता था। इस प्रक्रिया में डार्क वेब का इस्तेमाल किया जाता था ताकि ट्रांजेक्शन का पता लगाना मुश्किल हो सके।

सैकड़ों एटीएम कार्ड और पासबुक बरामद

क्राइम ब्रांच की कार्रवाई के दौरान आरोपियों के पास से सैकड़ों एटीएम कार्ड, बैंक पासबुक और कई खातों की डिटेल बरामद हुई है। पुलिस अब इन खातों के ट्रांजेक्शन खंगाल रही है। आशंका जताई जा रही है कि इस नेटवर्क के जरिए करोड़ों रुपये की साइबर ठगी को अंजाम दिया गया है।

जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने में जुटी हैं कि ग्वालियर के अलावा अन्य शहरों में इस गिरोह के कितने सदस्य सक्रिय हैं। पुलिस को संदेह है कि यह नेटवर्क केवल मध्यप्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के कई राज्यों में फैला हुआ है।

होटल का कमरा बना था कंट्रोल रूम

जांच में यह भी सामने आया कि होटल एचजी का कमरा पूरी तरह से एक मिनी साइबर कंट्रोल रूम में बदल दिया गया था। कमरे में कई मोबाइल फोन लगातार एक्टिव थे और अलग-अलग बैंक खातों की जानकारी संभालने के लिए लैपटॉप का इस्तेमाल किया जा रहा था। आरोपी यहां बैठकर पैसों के ट्रांजेक्शन मॉनिटर करते थे और निर्देश मिलने पर रकम आगे ट्रांसफर कर देते थे।

क्राइम ब्रांच अधिकारियों के मुताबिक, होटल में रुककर काम करने का मकसद लगातार लोकेशन बदलना था ताकि पुलिस को उन तक पहुंचने में मुश्किल हो। आरोपी कुछ दिनों तक एक जगह रहते और फिर दूसरी जगह शिफ्ट हो जाते थे।

क्रिप्टो ट्रेडिंग बना नया हथियार

पुलिस पूछताछ में यह भी खुलासा हुआ है कि साइबर ठगी से हासिल रकम को भारत में लंबे समय तक नहीं रखा जाता था। रकम को पहले कैश में बदला जाता, फिर क्रिप्टो ट्रेडिंग के जरिए विदेश भेज दिया जाता था। इससे पैसों का ट्रैक पकड़ना बेहद मुश्किल हो जाता था।

साइबर विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराधी अब क्रिप्टोकरेंसी का इस्तेमाल तेजी से कर रहे हैं, क्योंकि इसमें ट्रांजेक्शन की पहचान छिपाना आसान होता है। यही वजह है कि जांच एजेंसियों के सामने ऐसे मामलों की तह तक पहुंचना चुनौती बनता जा रहा है।

कई बड़े खुलासों की उम्मीद

ग्वालियर क्राइम ब्रांच फिलहाल गिरफ्तार आरोपियों से गहन पूछताछ कर रही है। पुलिस को उम्मीद है कि इस गिरोह से जुड़े कई अन्य बड़े नाम और नेटवर्क सामने आ सकते हैं। साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि अब तक कितने लोगों को साइबर ठगी का शिकार बनाया गया है।

क्राइम ब्रांच अधिकारियों का कहना है कि आरोपियों के मोबाइल और लैपटॉप से मिले डेटा को साइबर एक्सपर्ट की मदद से खंगाला जा रहा है। जांच पूरी होने के बाद कई और गिरफ्तारियां हो सकती हैं।

इस कार्रवाई को ग्वालियर क्राइम ब्रांच की बड़ी सफलता माना जा रहा है। पुलिस का कहना है कि साइबर अपराध के खिलाफ लगातार अभियान चलाया जाएगा और ऐसे नेटवर्क से जुड़े लोगों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।