आय से 241% अधिक संपत्ति का मामला: महिला एवं बाल विकास विभाग के संयुक्त संचालक लक्ष्मी नारायण कंडवाल लोकायुक्त जांच के घेरे में

बाल विकास विभाग के जॉइंट डायरेक्टर लक्ष्मीनारायण कंडवाल पर लोकायुक्त के छापे में 11 करोड़ रुपये की अवैध संपत्ति का खुलासा

आय से 241% अधिक संपत्ति का मामला: महिला एवं बाल विकास विभाग के संयुक्त संचालक लक्ष्मी नारायण कंडवाल लोकायुक्त जांच के घेरे में

महिला एवं बाल विकास विभाग के संयुक्त संचालक लक्ष्मीनारायण कंडवाल पर लोकायुक्त ने शिकंजा कस दिया है। लोकायुक्त को रिश्तेदारों के नाम से खरीदी संपत्ति की जानकारी मिली है।

इंदौर। मध्य प्रदेश के महिला एवं बाल विकास विभाग में पदस्थ संयुक्त संचालक लक्ष्मी नारायण कंडवाल के खिलाफ लोकायुक्त की कार्रवाई ने प्रदेश में सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर नई बहस छेड़ दी है। लोकायुक्त जांच में दावा किया गया है कि करीब 30 वर्षों की सरकारी सेवा के दौरान उनकी वैध आय लगभग 2.5 करोड़ रुपये रही, जबकि अब तक सामने आई संपत्तियों का मूल्य करीब 9.5 करोड़ रुपये आंका गया है। जांच एजेंसी के अनुसार यह संपत्ति उनकी ज्ञात आय से लगभग 241 प्रतिशत अधिक है।

यह मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि कंडवाल जिस विभाग में कार्यरत हैं, वह महिलाओं और बच्चों के पोषण, आंगनवाड़ी सेवाओं, किशोरी स्वास्थ्य कार्यक्रमों और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के संचालन से जुड़ा है। ऐसे में एक वरिष्ठ अधिकारी पर आय से अधिक संपत्ति के आरोप लगने से विभागीय कार्यप्रणाली और योजनाओं के क्रियान्वयन पर भी सवाल उठ रहे हैं।

लोकायुक्त की कार्रवाई केवल संपत्तियों तक सीमित नहीं है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि क्या सरकारी योजनाओं के संचालन, भुगतान प्रक्रियाओं और प्रशासनिक निर्णयों में किसी प्रकार की अनियमितता या प्रभाव का इस्तेमाल कर निजी लाभ अर्जित किया गया। हालांकि अभी तक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा गया है और जांच जारी है।

महत्वपूर्ण पद पर रहे कंडवाल

महिला एवं बाल विकास विभाग में संयुक्त संचालक का पद संभाग स्तर पर बेहद प्रभावशाली माना जाता है। इस पद के माध्यम से कई जिलों में संचालित पोषण अभियान, आंगनवाड़ी केंद्रों की गतिविधियों, महिला सुरक्षा योजनाओं, वन स्टॉप सेंटर और अन्य कल्याणकारी कार्यक्रमों की निगरानी की जाती है।

सरकारी फंड के वितरण, भुगतान स्वीकृति, निर्माण कार्यों की निगरानी और विभिन्न प्रशासनिक निर्णयों में इस स्तर के अधिकारी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसी कारण लोकायुक्त की कार्रवाई को विभागीय दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

जांच में चार प्रमुख बिंदु

लोकायुक्त जांच में चार ऐसे क्षेत्रों को चिन्हित किया गया है जिनमें संभावित अनियमितताओं की पड़ताल की जा रही है।

पहला क्षेत्र आंगनवाड़ी बच्चों को मिलने वाले पोषण आहार और उससे जुड़े भुगतान हैं। जांच एजेंसियां यह देख रही हैं कि भोजन की गुणवत्ता, आपूर्ति और भुगतान प्रक्रिया में कहीं नियमों का उल्लंघन तो नहीं हुआ।

दूसरा क्षेत्र आंगनवाड़ी भवनों के निर्माण और मरम्मत कार्यों से संबंधित है। इन कार्यों में खर्च की गई राशि और वास्तविक कार्यों के बीच सामंजस्य की जांच की जा रही है।

तीसरा बिंदु विभागीय जांचों और प्रशासनिक मामलों में कथित लेन-देन से जुड़ा है। जांच अधिकारी यह पता लगाने का प्रयास कर रहे हैं कि कहीं पद के प्रभाव का उपयोग निजी लाभ के लिए तो नहीं किया गया।

चौथा क्षेत्र छात्रावासों और वन स्टॉप सेंटरों के संचालन से जुड़े फैसलों का है। इन योजनाओं में लिए गए निर्णयों और उनसे जुड़े वित्तीय पहलुओं की भी समीक्षा की जा रही है।

हालांकि लोकायुक्त ने अभी तक किसी भी आरोप की अंतिम पुष्टि नहीं की है और सभी पहलुओं की जांच जारी है।

डेढ़ महीने तक चली गोपनीय पड़ताल

सूत्रों के अनुसार लोकायुक्त को शिकायत मिलने के बाद एक विशेष टीम गठित की गई थी। टीम ने करीब डेढ़ महीने तक गोपनीय रूप से जांच की और विभिन्न विभागों से वित्तीय रिकॉर्ड, संपत्ति विवरण तथा बैंकिंग जानकारी जुटाई।

जांच के दौरान अधिकारियों ने परिवार के सदस्यों, व्यवसायिक गतिविधियों और अचल संपत्तियों से जुड़े दस्तावेजों का भी अध्ययन किया। इसके बाद प्राप्त तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की गई।

जिम और सुपर मार्केट ने बढ़ाया संदेह

जांच के दौरान लोकायुक्त अधिकारियों को कंडवाल के नाम से जुड़े एक चार मंजिला व्यावसायिक भवन की जानकारी मिली। इस भवन में डिपार्टमेंटल स्टोर, आधुनिक जिम और आवासीय सुविधाएं मौजूद बताई गईं।

प्रारंभिक जांच में जिम में लगी मशीनों और अन्य संसाधनों का मूल्य लगभग 40 लाख रुपये से अधिक आंका गया। बताया जाता है कि लोकायुक्त के कुछ अधिकारी ग्राहक बनकर जिम पहुंचे और वहां उपलब्ध सुविधाओं तथा निवेश का आकलन किया।

इसके बाद भवन से जुड़े दस्तावेजों, निवेश स्रोतों और स्वामित्व संबंधी रिकॉर्ड की विस्तृत जांच शुरू की गई। अधिकारियों ने यह भी पता लगाने का प्रयास किया कि इन निवेशों के लिए धन कहां से आया और क्या उसका विवरण आधिकारिक आय से मेल खाता है।

बैंक लॉकर और खातों की जांच

लोकायुक्त जांच के दौरान बैंक ऑफ इंडिया की सराफा शाखा में एक लॉकर की जानकारी भी सामने आई। प्रारंभिक जांच में लॉकर से 25 लाख रुपये से अधिक मूल्य का सोना मिलने की बात कही जा रही है।

इसके अलावा भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) और इंडियन ओवरसीज बैंक के कुछ खातों को भी जांच के दायरे में लिया गया है। संबंधित खातों के लेन-देन, जमा राशि और वित्तीय गतिविधियों का विश्लेषण किया जा रहा है।

जांच अधिकारियों का मानना है कि बैंकिंग रिकॉर्ड और वित्तीय दस्तावेजों की पूरी जांच के बाद संपत्तियों का वास्तविक मूल्य और अधिक सामने आ सकता है।

कई संपत्तियों का पता चला

जांच में इंदौर शहर में स्थित व्यावसायिक भवन, स्कीम नंबर-140 क्षेत्र में दो प्लॉट तथा महू क्षेत्र के आसपास कृषि भूमि की जानकारी भी सामने आई है। लोकायुक्त अब इन संपत्तियों के अधिग्रहण की प्रक्रिया, खरीद के समय उपयोग किए गए धन के स्रोत और संबंधित दस्तावेजों की जांच कर रही है।

यदि जांच में आय और संपत्ति के बीच असामान्य अंतर साबित होता है तो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आगे की कार्रवाई संभव है।

जवाबदेही पर उठे सवाल

इस मामले ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि महिलाओं और बच्चों के कल्याण के लिए आवंटित सरकारी धन की निगरानी कितनी प्रभावी है। सामाजिक क्षेत्र से जुड़े विभागों में पारदर्शिता, वित्तीय नियंत्रण और जवाबदेही सुनिश्चित करने की आवश्यकता को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है।

फिलहाल लोकायुक्त की जांच जारी है और अंतिम निष्कर्ष सामने आना बाकी है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि सामने आई संपत्तियां वैध आय के अनुरूप हैं या फिर किसी प्रकार की वित्तीय अनियमितता का परिणाम। तब तक यह मामला प्रदेश के सबसे चर्चित भ्रष्टाचार मामलों में से एक बना हुआ है।