मंत्री राकेश सिंह पर IAS अधिकारी को धमकाने के आरोप: बंगले पर बुलाकर अपमानित करने का मामला गरमाया
जबलपुर में PWD मंत्री राकेश सिंह पर आरोप है कि उन्होंने स्मार्ट सिटी CEO और IAS अधिकारी अरविंद शाह को अपने बंगले पर बुलाकर अपमानित किया और धमकाया। विवाद की शुरुआत कर्मचारियों की अनुपस्थिति पर वेतन रोकने की कार्रवाई से हुई। घटना के बाद शाह ने मुख्य सचिव अनुराग जैन को जानकारी दी। मामले से प्रशासनिक हलकों में नाराजगी है और IAS एसोसिएशन ने भी आपत्ति जताई है, जिससे राजनीतिक और प्रशासनिक टकराव बढ़ गया है।
मोहन सरकार में लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह विवादों में घिर गए हैं। उन पर जबलपुर स्मार्ट सिटी के सीईओ IAS अरविंद शाह को अपने बंगले पर तलब कर अपमानित करने, गालियां देने और जान से मारने की धमकी देने का गंभीर आरोप लगा है।
जबलपुर: मध्यप्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक तंत्र के बीच एक बार फिर टकराव की स्थिति बनती दिखाई दे रही है। लोक निर्माण विभाग (PWD) के मंत्री राकेश सिंह पर गंभीर आरोप लगे हैं कि उन्होंने जबलपुर स्मार्ट सिटी के सीईओ और आईएएस अधिकारी अरविंद शाह को अपने बंगले पर बुलाकर न केवल अपमानित किया बल्कि उन्हें धमकाया भी। इस पूरे घटनाक्रम ने प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी है और आईएएस एसोसिएशन ने भी इस पर आपत्ति जताते हुए मामला मुख्यमंत्री के संज्ञान में लाने की तैयारी कर ली है।
कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद?
सूत्रों के अनुसार यह विवाद 17 मार्च 2026 से शुरू हुआ, जब अरविंद शाह ने जबलपुर स्मार्ट सिटी का प्रभार संभाला। पदभार ग्रहण करते ही उन्होंने कार्यप्रणाली में सुधार के लिए सख्त कदम उठाने शुरू किए। उन्होंने कर्मचारियों की उपस्थिति की जांच करवाई और कामकाज की नियमित मॉनिटरिंग शुरू की।
इस जांच के दौरान कई कर्मचारी अनुपस्थित पाए गए। नियमों के तहत उनके वेतन को अस्थायी रूप से रोक दिया गया। बताया जा रहा है कि कुल छह कर्मचारियों का रिकॉर्ड संतोषजनक नहीं था, जिसके चलते यह कार्रवाई की गई। यहीं से विवाद की नींव पड़ी।
कर्मचारी कार्रवाई से बढ़ा मामला
इस पूरे मामले में दिलप्रीत कौर भल्ला नाम की एक कर्मचारी का मामला भी सामने आया। उनकी उपस्थिति और कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठे थे। 21 अप्रैल को निर्देश दिए गए कि उनका वेतन शर्तों के साथ जारी किया जाए और उनकी नियमित उपस्थिति सुनिश्चित की जाए।
इसके अगले ही दिन यानी 22 अप्रैल को अरविंद शाह ने उन्हें कार्यालय बुलाकर चर्चा की। बताया जा रहा है कि इसी घटनाक्रम के कुछ घंटों बाद मामला अचानक तूल पकड़ गया और राजनीतिक स्तर तक पहुंच गया।
मंत्री आवास पर क्या हुआ?
सूत्रों के मुताबिक 22 अप्रैल को अरविंद शाह को मंत्री राकेश सिंह के आवास पर बुलाया गया। उस समय नगर निगम आयुक्त राम अहिरवार भी वहां मौजूद थे।
बताया जाता है कि मंत्री इस मुद्दे को लेकर पहले से नाराज थे। अधिकारियों ने स्थिति को देखते हुए शाह को सलाह दी कि वे संयम बनाए रखें और औपचारिक रूप से बातचीत करें। लेकिन आरोप है कि बैठक के दौरान माहौल तनावपूर्ण हो गया और तीखी बहस के बीच कथित रूप से अपमानजनक व्यवहार किया गया। यहां तक कि धमकी देने की बात भी सामने आई है।
हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है, लेकिन मामला तेजी से चर्चा का विषय बन गया है।
मुख्य सचिव को दी गई जानकारी
घटना के बाद अरविंद शाह ने पूरे घटनाक्रम की जानकारी प्रदेश के मुख्य सचिव अनुराग जैन को दी। उन्होंने अपना पक्ष विस्तार से रखते हुए पूरे मामले की रिपोर्ट सौंपी।
बताया जा रहा है कि प्रशासनिक स्तर पर इस घटना को गंभीरता से लिया जा रहा है और वरिष्ठ अधिकारियों के बीच इस पर लगातार चर्चा हो रही है।
प्रशासनिक हलकों में नाराजगी
इस पूरे घटनाक्रम के बाद आईएएस अधिकारियों के बीच नाराजगी बढ़ती जा रही है। कई अधिकारियों का मानना है कि यदि किसी अधिकारी के साथ इस तरह का व्यवहार होता है, तो यह प्रशासनिक स्वतंत्रता और कार्यशैली पर सीधा असर डाल सकता है।
आईएएस एसोसिएशन ने भी इस मुद्दे को गंभीर मानते हुए मुख्यमंत्री के सामने अपनी आपत्ति दर्ज कराने का निर्णय लिया है। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस पर औपचारिक प्रतिक्रिया सामने आ सकती है।
राजनीतिक बनाम प्रशासनिक टकराव
यह मामला केवल एक व्यक्तिगत विवाद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब यह राजनीतिक और प्रशासनिक टकराव का रूप लेता जा रहा है। एक ओर जहां मंत्री पर आरोप लग रहे हैं, वहीं दूसरी ओर यह बहस भी तेज हो गई है कि क्या प्रशासनिक अधिकारियों को अपने काम में राजनीतिक हस्तक्षेप का सामना करना पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों से शासन व्यवस्था की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।
सरकार की भूमिका पर नजर
फिलहाल इस पूरे मामले में सरकार की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। लेकिन जिस तरह से मामला तूल पकड़ रहा है, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में सरकार को इस पर स्पष्ट रुख अपनाना पड़ सकता है।
सभी की नजर अब इस बात पर टिकी है कि क्या इस मामले की जांच होगी, क्या संबंधित पक्षों से स्पष्टीकरण मांगा जाएगा, और क्या किसी तरह की कार्रवाई की जाएगी।
जबलपुर में सामने आया यह विवाद प्रदेश की प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था के बीच संतुलन पर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह न केवल एक अधिकारी के सम्मान का मुद्दा है, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे की गरिमा से जुड़ा मामला बन जाता है।
वहीं दूसरी ओर, यह भी जरूरी है कि मामले की निष्पक्ष जांच हो और सभी पक्षों को सुनकर उचित निर्णय लिया जाए। फिलहाल यह विवाद मध्यप्रदेश की राजनीति और प्रशासन दोनों के लिए एक अहम परीक्षा बन गया है।
प्रखर न्यूज़ व्यूज एक्सप्रेस