चंबल की माटी पुकार रही: गुमनाम वीरों को इतिहास में सम्मान दिलाने की मुहिम तेज

भिंड में चंबल फाउंडेशन द्वारा चलाए जा रहे “चंबल मिशन” अभियान के तहत 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के गुमनाम क्रांतिवीरों—जीता चमार, जंगली-मंगली मेहतर और मारून सिंह लोधी—को इतिहास में सम्मान दिलाने की मांग तेज हो गई है। गांव-गांव जनचौपाल और जनसंपर्क कार्यक्रम आयोजित कर लोगों को इन वीरों के संघर्ष और बलिदान से परिचित कराया जा रहा है।

चंबल की माटी पुकार रही: गुमनाम वीरों को इतिहास में सम्मान दिलाने की मुहिम तेज

1857 के उपेक्षित क्रांतिवीरों को पहचान दिलाने की मांग

गांव-गांव जनचौपाल से जागी इतिहास की चेतना

जीता चमार, जंगली-मंगली मेहतर और मारून सिंह लोधी फिर चर्चा में

“चंबल शौर्य स्मारक” निर्माण की उठी मांग

भिंड। चंबल की धरती एक बार फिर अपने गौरवशाली इतिहास और गुमनाम क्रांतिवीरों की स्मृतियों को लेकर चर्चा में है। चंबल फाउंडेशन द्वारा संचालित “चंबल मिशन” अभियान के तहत 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के उन उपेक्षित सेनानियों को इतिहास में सम्मानजनक स्थान दिलाने की मांग तेज हो गई है, जिनके बलिदान और संघर्ष को अब तक व्यापक पहचान नहीं मिल सकी। इस अभियान में विशेष रूप से जीता चमार, जंगली-मंगली मेहतर और मारून सिंह लोधी जैसे क्रांतिनायकों के योगदान को सामने लाया जा रहा है।

अभियान के अंतर्गत गांव-गांव जनचौपालों का आयोजन कर लोगों को चंबल क्षेत्र के स्वतंत्रता संग्राम की गौरवशाली परंपरा से परिचित कराया जा रहा है। हाल ही में जिला एवं सत्र न्यायालय भिंड परिसर में भी जनसंपर्क कार्यक्रम आयोजित किया गया, जहां बड़ी संख्या में लोगों ने अभियान का समर्थन किया। अभियान से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि इन क्रांतिवीरों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ निर्णायक संघर्ष किया, लेकिन स्वतंत्रता के दशकों बाद भी उन्हें इतिहास में वह स्थान नहीं मिला जिसके वे वास्तविक हकदार थे।

चंबल मिशन के कार्यकर्ता गांवों में जाकर लोकगीतों, कथाओं और संवादों के माध्यम से नई पीढ़ी को इन वीरों के शौर्य और बलिदान की कहानियां सुना रहे हैं। उनका मानना है कि जिस चंबल को लंबे समय तक केवल बीहड़ और अपराध की पहचान से जोड़ा गया, उसकी असली पहचान विद्रोह, आत्मसम्मान और स्वतंत्रता संग्राम की रही है। इसी सोच को जन-जन तक पहुंचाने के लिए जनचौपालों के साथ हस्ताक्षर अभियान भी चलाया जा रहा है। कागज और कपड़े दोनों पर लोगों से समर्थन लिया जा रहा है, ताकि व्यापक जनसमर्थन के साथ सरकार तक मांग पहुंचाई जा सके।

अभियान की सबसे प्रमुख मांग “चंबल शौर्य स्मारक” के निर्माण को लेकर उठ रही है। प्रस्तावित स्मारक में इन क्रांतिवीरों की प्रतिमाएं स्थापित करने, एक आधुनिक पुस्तकालय बनाने, ऑडिटोरियम विकसित करने, लाइट एंड साउंड शो शुरू करने और ‘चंबल गाथा’ नामक डॉक्यूमेंट्री तैयार करने जैसे प्रस्ताव शामिल हैं। इसके अलावा इन वीरों के सम्मान में डाक टिकट जारी करने तथा चंबल क्षेत्र के इतिहास और संस्कृति पर केंद्रित विश्वविद्यालय स्थापित करने की मांग भी की जा रही है।

अभियान से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि इन गुमनाम नायकों की गाथाओं को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए तो नई पीढ़ी अपने क्षेत्र के वास्तविक इतिहास और बलिदानी परंपरा से जुड़ सकेगी। उनका मानना है कि इतिहास केवल बड़े नामों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उन स्थानीय वीरों को भी समान सम्मान मिलना चाहिए जिन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

चंबल मिशन के अनुसार 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान चकरनगर और भरेह रियासत ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका था। उस दौर में पंचनद घाटी को स्वतंत्र घोषित कर दिया गया था और चंबल के रणबांकुरों ने अंग्रेजी सेना को कई मोर्चों पर चुनौती दी थी। अभियान के कार्यकर्ताओं का कहना है कि अंग्रेजों के खिलाफ यह संघर्ष केवल हथियारों का नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और स्वतंत्रता की भावना का प्रतीक था।

जंगली-मंगली मेहतर को इस अभियान में दलित शौर्य और प्रतिरोध के अमर प्रतीक के रूप में याद किया जा रहा है। बताया जा रहा है कि उन्होंने चकरनगर को केंद्र बनाकर अंग्रेजों के खिलाफ कई लड़ाइयां लड़ीं और वर्ष 1858 में वीरगति प्राप्त की। वहीं बंसरी गांव के जीता चमार को पंचनद क्षेत्र का निर्भीक योद्धा बताया गया है, जिन्होंने अंग्रेजों द्वारा दिए गए आत्मसमर्पण के प्रस्ताव को अस्वीकार कर अंत तक संघर्ष जारी रखा।

मारून सिंह लोधी को चंबल का सबसे निर्भीक क्रांतिनायक बताते हुए अभियान के कार्यकर्ता कहते हैं कि उनकी वीरता का उल्लेख ब्रिटिश दस्तावेजों में भी मिलता है। अंग्रेज अधिकारी ए.ओ. ह्यूम ने उन्हें “नॉर्थ-वेस्टर्न प्रोविन्स का सबसे खतरनाक व्यक्ति” तक कहा था। गिरफ्तारी और फांसी की सजा के बावजूद उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष नहीं छोड़ा और अंतिम समय तक विद्रोह की मशाल जलाए रखी।

अभियान के दौरान चौरेला, हुकुमपुरा, बेनीपुरा, बंसरी, रौरा का पुरा, लुहिया खुर्द, रेलवे कॉलोनी, रमी का वर, बहादुरपुर लोहिया, भीखेपुर, बाबरपुर, शेरपुर कोठी, जगम्मनपुर, गढ़िया मुलू सिंह, राजपुर, अयारा, झम्मनपुर, बादरीपूठ, बनकटी खुर्द, शिवराजपुर, हरनाथपुर, कल्याणपुर, रजपुरा, नगला ताड़, लोहिया कला, भारौली का पुरा, जामना और पान सिंह का पुरा सहित कई गांवों में जनसंपर्क और जनचौपाल कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं। इन कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में ग्रामीण, युवा और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हो रहे हैं।

जिला एवं सत्र न्यायालय भिंड परिसर में आयोजित कार्यक्रम में डॉ. शाह आलम राना, देवेंद्र सिंह चौहान, सुनील कुमार, मान सिंह, नरेंद्र त्रिपाठी, गजेंद्र सिंह और नारायण शाक्य सहित कई लोग मौजूद रहे। सभी ने एक स्वर में कहा कि चंबल के इन गुमनाम क्रांतिवीरों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना समय की आवश्यकता है।

चंबल मिशन से जुड़े लोगों का कहना है कि स्वतंत्र भारत में इतिहास लेखन के दौरान कई स्थानीय और क्षेत्रीय नायकों की उपेक्षा हुई है। उनका मानना है कि अब समय आ गया है जब ऐसे वीरों के योगदान का ईमानदारी से पुनर्मूल्यांकन किया जाए और उन्हें इतिहास के पन्नों में सम्मानजनक स्थान दिया जाए। अभियान के समापन के बाद एक विस्तृत ज्ञापन सरकार को सौंपा जाएगा, जिसमें स्मारक निर्माण, पाठ्यक्रम में शामिल करने और राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान देने की मांग प्रमुख रूप से रखी जाएगी।

चंबल की धरती से उठ रही यह आवाज अब केवल एक अभियान नहीं, बल्कि अपने इतिहास, अस्मिता और बलिदानी परंपरा को पहचान दिलाने की जनभावना बनती जा रही है।